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काल भैरव जयंती और काल भैरव व्रत कथा

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काल भैरव जयंती –  हर साल मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव जयंती मनायी जाती है। भगवान काल भैरव का जन्म मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था।

काल भैरव की पूजा विधि
इस दिन भगवान शिव के स्‍वरूप काल भैरव की पूजा करनी चाहिए। इस दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर नित्य-क्रिया आदि कर स्वच्छ हो जाएं। गंगा जल से शुद्धि करें। व्रत करना चाहते है तो संकल्प लें। पितरों को याद करें और उनका श्राद्ध करें। ह्रीं उन्मत्त भैरवाय नमः का जाप करें। इसके उपरान्त काल भैरव की आराधना करें। और काल भैरव भगवान की आरती करें। इनकी पूजा आधी रात में की जाती हैं इनकी पूजा में धूप, काले तिल, दीपक, उड़द और सरसों के तेल का प्रयोग किया जाता है। व्रत के सम्पूर्ण होने के बाद काले कुत्‍ते को मीठी रोटियां खिलाएं।

काल भैरव की कथा
एक बार भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से पूछा कि इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ रचनाकार कौन है। ब्रह्मा जी ने इसके जवाब में स्वयं का नाम लिया। इस समय ब्रह्मा जी की वाणी अहंकार युक्त थी, जिससे विष्णु जी को क्रोध आ गया। तब ब्रह्मा और विष्णु वे दोनों अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए चारों वेदों के पास गए। चारों वेदों ने उनको बताया कि भगवान शिव ही सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार हैं।

भगवान शिव ने ब्रह्म हत्या से मुक्ति के लिए भैरव को सभी तीर्थों के दर्शन करने को कहा। तब एक हाथ में ब्रह्मा जी का कटा हुआ सिर लेकर काल भैरव ने बारी-बारी से सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन किए और सभी नदियों में स्नान किया। फिर भी ब्रह्म हत्या के पाप से काल भैरव को मुक्ति नहीं मिली। अंत में काल भैरव काशी पहुंचे, जहां उनको ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। ब्रह्मा जी का पांचवां सिर उनके हाथ से जमीन पर गिर पड़ा। उस जगह को कपाल मोचन तीर्थ कहा जाता है।

इसके बाद से काशी में ही काल भैरव जी सदा के लिए बस गए। ऐसा कहना है कि तब से काल भैरव काशी में ही स्थायी रूप से निवास करते हैं।

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