Shani Jayanti 2021 | शनि जयंती पूजा विधि, मुहूर्त, जन्म कथा, महत्व

Shani Jayanti 2021 | शनि जयंती पूजा विधि, मुहूर्त, जन्म कथा, महत्व

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शनि देव को न्यायाधिपति कहा जाता है। इनकी सवारी गिद्ध है। शनि देव मकर और कुंभ राशि के स्वामी है। इनकी चाल बहुत धीमी है। शनि देव ढाई साल बाद अपनी राशि बदलते है। 19 वर्षों तक इनकी महादशा रहती है। हिन्दू पचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को शनि जयंती मनायी जाती है। इसे शनि अमावस्या भी कहते है। कहा जाता है कि इस दिन ही शनि देव का जन्म हुआ था। शनि देव भगवान सूर्य तथा छाया के पुत्र है। सूर्य के अन्य पुत्रों की अपेक्षा शनि विपरीत स्वभाव के हैं।

शनिदेव की पूजा करने का शुभ मुहूर्त :-

  • अमावस्या तिथि प्रारंभ – 09 जून, 2021 दोपहर 01 बजकर 57 मिनट से
  • अमावस्या तिथि समाप्त – 10 जून, 2021 शाम 04 बजकर 22 मिनट

पूजा विधि

  • शनि जयंती के दिन सबसे पहले सुबह उठकर नित्यकर्म और स्नानादि से निवृत हो। उसके बाद पूजा करें। अगर आप व्रत करना चाहते हैं तो व्रत का संकल्प लें।
  •  शनिदेव की मूर्ति पर तेल, फूल, माला आदि चढ़ाएं। शनि देव पर काली उड़द और तिल चढ़ाना शुभ होता है। अतः शनि देव जी की मूर्ति पर सरसों का तेल, काले उड़द तथा काले तिल चढ़ाएं।
  • अब फूल माला तथा प्रसाद अर्पित करें।
  • इसके बाद दीपक जलाएं और शनि चालीसा का पाठ करें तथा यथासम्भव मंत्र पढ़े – ‘ॐ शं शनिश्चराय नम:। ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः।’
  •  इस दिन किसी निर्धन व्यक्ति को खाना खिलायें। इसके अलावा दान-पुण्य करना चाहिए। कई लोग शनि देव को दुःख और परेशानियों का देवता मानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है, शनिदेव व्यक्ति के कर्मों के हिसाब से फल देते हैं।

भगवान शनि देव की जन्म कथा

स्कंद पुराण के काशीखंड में बताया गया है कि शनि देव के पिता सूर्य और माता का नाम छाया है। माता छाया को संवर्णा के भी नाम से जाना जाता है। वहीं एक अन्य कथा के अनुसार, शनि देव का जन्म ऋषि कश्यप के अभिभावकत्व यज्ञ से हुआ माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देवता के साथ हुआ। संज्ञा सूर्यदेव के तेज से परेशान रहती थीं। दिन बीतते गए और संज्ञा ने मनु, यमराज और यमुना नामक तीन संतानों को जन्म दिया। सूर्येदेव का तेज संज्ञा ज्यादा दिनों तक सह नहीं पाईं, लेकिन बच्चों के पालन के लिए उन्होंने अपने तप से अपनी छाया को सूर्यदेव के पास छोड़कर चली गईं।

संज्ञा की प्रतिरूप होने की वजह से इनका नाम छाया हुआ। संज्ञा ने छाया को सूर्यदेव के बच्चों की जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि यह राज मेरे और तुम्हारे बीच ही रहना चाहिए। संज्ञा पिता के घर पंहुचीं, तो उन्हें वहां शरण नहीं मिली। संज्ञा वन में जाकर घोड़ी का रूप धारण करके तपस्या में लीन हो गईं। उधर सूर्यदेव को भनक भी नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली संज्ञा नहीं, संवर्णा हैं। संवर्णा ने बखूबी से नारीधर्म का पालन किया।

छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से कोई परेशानी भी नहीं हो रही थी। सूर्यदेव और संवर्णा के मिलन से मनु, शनि देव और भद्रा तीन संतानों ने जन्म लिया। जब शनि देव छाया के गर्भ में थे, तब छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। तपस्या के दौरान भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने का प्रभाव छाया के गर्भ में पल रही संतान पर भी पड़ा। इसकी वजह से शनि देव का रंग काला है। जन्म के समय शनि देव के रंग को देखकर सूर्यदेव ने पत्नी छाया पर संदेह करते हुए उन्हें अपमानित किया।

मां के तप की शक्ति शनि देव को गर्भ में प्राप्त हो गई। उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा, तो उनकी शक्ति से काले पड़ गए और उनको कुष्ठ रोग हो गया। घबराकर सूर्यदेव भगवान शिव की शरण में पहुंचे। शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का बोध करवाया। सूर्यदेव ने पश्चाताप में क्षमा मांगी, फिर से उन्हें अपना असली रूप वापस मिला। इस घटनाक्रम की वजह से पिता और पुत्र का संबंध हमेशा के लिए खराब हो गया।

शनि जयंती का महत्व

शनि जयंती या शनि अमावस्या के दिन शनि देव की पूजा करने से लोगों की कुंडली के शनि दोष, ढैय्या, साढ़ेसाती आदि के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है। जो लोग शनि की ढैय्या या साढेसाती से पीड़ित होते हैं, उनको आज के दिन पूजा से राहत मिलती है। शनि देव को कर्म फलदाता कहा जाता है। वे लोगों को उनके कर्मों के अनुसार फल देने के लिए जाने जाते हैं।

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(कुल अवलोकन 17 , 3 आज के अवलोकन)
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