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शुक्र प्रदोष व्रत कथा(Shukra Pradosh Vrat Katha)

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जो प्रदोष व्रत शुक्रवार को पड़ता है उसे शुक्र प्रदोष कहते है। शुक्रवार के शुभ योग में प्रदोष का व्रत करने से आपको भगवान शिव के साथ मां लक्ष्‍मी भी प्रसन्‍न होती हैं।

प्रदोष व्रत : कृष्ण पक्ष तिथि और शुभ मुहूर्त

माघ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि शुक्रवार 15 जनवरी को शाम 08 बजकर 16 मिनट से प्रारंभ होगी और 16 जनवरी को रात 10 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगी। त्रयोदशी तिथि में प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। इस कारण 16 जनवरी 2026 को प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ समय शाम 05 बजकर 47 मिनट से लेकर 08 बजकर 29 मिनट तक रहेगा।

शुक्र प्रदोष व्रत कथा :
प्राचीन काल की बात है एक नगर में तीन मित्र रहते थे, तीनों में ही घनिष्ट मित्रता थी। उसमें एक राजा का बेटा, दूसरा ब्राह्मण पुत्र, तीसरा सेठ पुत्र था। राजकुमार व ब्राह्मण पुत्र का विवाह हो चुका था। सेठ पुत्र का विवाह के बाद गौना नहीं हुआ था। एक दिन तीनों मित्र आपस में स्त्रियों की चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण-पुत्र ने नारियों की प्रशंसा करते हुए कहा- “नारीहीन घर भूतों का डेरा होता है।” सेठ-पुत्र ने यह वचन सुनकर अपनी पत्नी लाने का तुरन्त निश्चय किया। सेठ-पुत्र अपने घर गया और अपने माता-पिता को अपना निश्चय बताया।

उन्होंने बेटे से कहा कि शुक्र देवता डूबे हुए हैं। इन दिनों बहु-बेटियों को उनके घर से विदा कराकर लाना शुभ नहीं, अतः शुक्रोदय के बाद तुम अपनी पत्नी को विदा करा लाना। सेठ पुत्र अपनी जिद से टस से मस नहीं हुआ और अपनी सुसराल जा पहुंचा। सास-ससुर को उसके इरादे का पता चला। उन्होंने उसको समझाने की कोशिश की किन्तु वह नहीं माना। अतः उन्हें विवश हो अपनी कन्या को विदा करना पड़ा। ससुराल से विदा होकर पति-पत्नी नगर से बाहर निकले ही थे कि उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट गया और एक बैल की टांग टूट गई। पत्नी को भी काफी चोट आई। सेठ-पुत्र ने आगे चलने का प्रयत्न जारी रखा तभी डाकुओं से भेंट हो गई और वे धन-धान्य लूटकर ले गए।

सेठ का पुत्र पत्नी सहित रोता-पीटता अपने घर पहुंचा। जाते ही उसे सांप ने डस लिया। उसके पिता ने वैद्यों को बुलाया। उन्होंने देखने के बाद घोषणा की कि आपका पुत्र 3 दिन में मर जाएगा। उसी समय इस घटना का पता ब्राह्मण पुत्र को लगा। उसने सेठ से कहा कि आप आपने लड़के को पत्नी सहित बहू के घर वापस भेज दो। यह सारी बाधाएं इस कारण से आई हैं कि आपका पुत्र शुक्रास्त में पत्नी को विदा कर लाया है, यदि यह वहां पहुंच जाएगा तो बच जाएगा। सेठ को ब्राह्मण-पुत्र की बात जंच गई और अपनी पुत्रवधु और पुत्र को वापिस लौटा दिया। वहां पहुंचते ही सेठ-पुत्र की हालत ठीक होनी आरंभ हो गई। तत्पश्चात उन्होंने शेष जीवन साथ में सुखपूर्वक बिताया और मृत्‍यु के बाद स्‍वर्ग लोक को गए।

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(कुल अवलोकन 92 , 1 आज के अवलोकन)
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