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माघ स्नान का महत्व और विधि | Magh Snan 2024

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माघ स्नान का महत्व और विधि – हमारे धर्म शास्त्र पुराणादि ग्रंथों में माघ, कार्तिक और वैशाख महीनों को महापुण्यफलदायी पवित्र मास माना जाता हैं। इन मासों में तीर्थ स्थलों पर नित्य स्नान, दान आदि करने से अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में सूर्योदय के समय को उत्तम माना गया है। उसके पश्चात जितने विलंब से स्नान किया जाता है उसी अनुपात में स्नान का पुण्य फल कम होता जाता है। अतः जहां तक सम्भव हो, उत्तम समय में ही स्नान करें।

स्नात्वा माघे शुभे तीर्थे प्राप्नुवंतीप्सितं फलम।
सर्वेअधिकारिणो ह्मत्र विष्णुभक्तो यथा नृप।

माघ स्नान की विधि

स्नान के लिए प्रयाग, काशी, हरिद्वार आदि प्रमुख तीर्थ स्थल उत्तम माने गये हैं। यदि इन तीर्थों में नहीं जा सकें तो जहां भी स्नान करें वही उनका स्मरण करें। इसके अतिरिक्त वेग से बहने वाली नदी में स्नान करें या रातभर छत पर रखे हुए जल से भरे घट से स्नान करें। इसके अलावा दिन भर सूर्य की किरणों से तपे हुए जल से स्नान कर सकते हैं। स्नान के उपरांत सूर्यनारायण को जल का अर्घ्य दें और भगवान विष्णु की पूजा करें। अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुसार अन्न और वस्त्र का दान करें। माघ स्नान बाल, युवा, वृद्ध, स्त्रियाँ, पुरुष, ब्रहम्चारी, संन्यासी, वानप्रस्थी सभी कर सकते हैं।

माघ स्नान की अवधि के संबंध में शास्त्रों में तीन प्रकार से उल्लेख हैं – पौष शुक्ल एकादशी से माघ शुक्ल एकादशी तक, पौष शुक्ल पूर्णिमा से माघ शुक्ल पूर्णिमा तक तथा मकर संक्रांति से कुंभ संक्रांति तक।

माघ स्नान का महत्व

माघ मास में यथा सम्भव नित्य स्नान करें। इसके अतिरिक्त माघ मास के प्रमुख पर्व संक्रांति, एकादशी, आमावस्या, पूर्णिमा आदि तिथियों को तीर्थ स्थल में श्रद्धा विश्वासपूर्वक स्नान, दान करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।अगर संम्पूर्ण मास में तीर्थ में स्नान आदि न कर सकें तो इन प्रमुख पुण्य पर्वों में स्नान करने से माघ स्नान का फल प्राप्त होता हैं। माघ स्नान करने से व्यक्ति को पाप, ताप, शाप से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में विशेष सुख शांति प्राप्त होती है। तीर्थ स्थल जाने पर अपने विचार एवं भावनाओं को पवित्र रखें। संयम पूर्वक सात्विक जीवन शैली का पालन करें क्योंकि शास्त्र में कहा गया है कि अन्य स्थान में किए गए पापों का प्रायश्चित तीर्थ स्थल में किए गए पुण्य कर्म से हो जाता है लेकिन तीर्थ स्थल पर किए गए पापों से मुक्ति नहीं मिलती है।

अन्य क्षेत्रे कृतं पापं तीर्थक्षेत्रे विनश्यति।
तीर्थ क्षेत्रे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति।

इसलिए स्नानकर्ता को तीर्थ क्षेत्र में जाकर शुद्ध सात्विक भाव से श्रद्धा और विश्वास के साथ धर्म का आचरण करना चाहिए। जिससे तीर्थ स्नान, दान आदि का पूरा फल प्राप्त हो सके और तीर्थ स्थलों की गरिमा बने रहे।

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